028 सीताफल के गुण और उससे होने वाले आयुर्वेदिक इलाज

 सीताफल के गुण और उससे होने वाले आयुर्वेदिक इलाज



परिचय (Introduction)

सीताफल की बेल होती है और इसे खेतों में लगाई जाती है। सीताफल गोला, छोटा बाहर की ओर उभरा हुआ होता है। सीताफल में काले और चिकने अनेक बीज होते हैं। इसके बीजों के इर्द-गिर्द मीठी गिरी होती है जिसका सेवन किया जाता है। सीताफल पौष्टिक और मीठा होता है। कुछ लोग सीताफल को रामफल के नाम से भी जानते हैं। सीताफल अधिक ठंडा होता है और ज्यादा सेवन करने से जुकाम हो जाता है।

गुण (Property)

सीताफल स्वाद में मीठा एवं पौष्टिक होता है। सीताफल अत्यंत ठंडा, पित्त को नष्ट करने वाला, उल्टी को रोकने वाला, प्यास को शांत करने वाला, कफ पैदा करने वाला एवं गैस बनाने वाला होता है। यह मांसपेशियां व खून को बढ़ाता है। यह ताकत को बढ़ाता है, हृदय रोग को दूर करता है और शरीर को पुष्ट करता है। कच्चे सीताफल दस्त और पेट के दर्द में उपयोगी होता है। इसके बीज पशुओं के जख्म को ठीक करता है। सीताफल के बीज का चूर्ण सेवन करने से गर्भपात होता है। पके सीताफल के छिलके को पीसकर जख्म पर लगाने से कीटाणु नष्ट होते हैं। इसके पत्तों को पीसकर फोड़ो पर बांधने से फोड़े ठीक होते हैं।

शरीर कमजोर होने, दिल की धड़कन बढ़ जाने, बेचैनी होने, दिल की मांसपेशियां ढ़ीली होने आदि रोग में सीताफल का सेवन करना लाभदायक है। इससे भस्मक रोग (बार-बार भूख लगना) ठीक होता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार : सीताफल में लोह, थायामिन, कैल्शियम, रीबोफ्लेबिन, नियासिन और विटामिन बी1, बी2 और विटामिन `सी´ तथा शर्करा काफी मात्रा में होता है।

हानिकारक प्रभाव (Harmful effects)

सीताफल का ज्यादा सेवन करने से ठंड लगकर बुखार हो जाता है। जिनकी पाचन क्रिया मंद हो या जुकाम हो उसे सीताफल का सेवन नहीं करना चाहिए। सीताफल के बीज आंखों में जाने पर जलन होती है।

विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases)

पित्तरोग :
पके सीताफल को रात में औंस में रखकर सुबह सेवन करने से पित्त की जलन समाप्त होती है।

पागलपन :
सीताफल की जड़ का चूर्ण पागलपन में दिया जाता है। इससे दस्त लगकर पागलपन दूर होता है।

पेशाब न आना :
सीताफल की बेल की जड़ को पानी में घिसकर पीने से रुका हुआ पेशाब आना शुरू हो जाता है।

मासिकधर्म का बंद होना :
मासिकस्राव बंद हो गया हो तो सीताफल के बीज को पीसकर बत्ती बना लें और इस बत्ती को योनि में रखें। इसके प्रयोग से बंद मासिकस्राव शुरू हो जाता है।

हिस्टीरिया :
हिस्टीरिया से पीड़ित स्त्री को यदि बार-बार बेहोशी के दौरे पड़ते हो तो सीताफल के पत्तों का रस निकालकर नाक में कुछ बूंदे डालना चाहिए। इससे बेहोशी दूर होती है।

घाव में कीड़े पड़ना :
सीताफल के पत्तों को पीसकर चटनी बनाएं और इसमें सेंधानमक मिलाकर पोटली बना लें। यह पोटली घाव पर बांधने से घाव में पड़े हुए कीड़े नष्ट होते हैं।

श्वास रोग :
सीताफल की छाल का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से श्वास (दमा) रोग ठीक होता है।

जुएं अधिक होना :
सीताफल के बीजों को पीसकर सिर पर लगाने से जुएं मर जाती है।

अतिक्षुधा भस्मक रोग :
सीताफल का सेवन प्रतिदिन करने से भस्मक (बार-बार भूख लगना) रोग ठीक होता है।

गर्भपात :
सीताफल के बीजों का चूर्ण 5 से 10 ग्राम की मात्रा में या काढ़ा लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में दिन में 4 बार सेवन करने से गर्भपात होता है।

पित्त पथरी :
पित्त पथरी के रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सीताफल के 25 मिलीलीटर रस में सेंधा नमक मिलाकर पीना चाहिए। इससे पथरी गलकर समाप्त होती है।

एलर्जी :
सीताफल के बीजों को पीसकर शहद के साथ दिन में 3 बार चाटने से एलर्जी दूर होती है।

नहरूआ :
नहरूआ रोग के रोगी को सीताफल के पत्ते को पीसकर टिकियां बनाकर घाव पर लगाएं। इससे घाव से बाल निकलकर घाव ठीक होता है।



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